Sunday, May 03, 2009

मंदी

कुछ और रोजगार छूटे, कुछ और घरों की नीलामी हुई |
बस इतनी सी बात हुई और मेरे देश में, दिन की शुरुआत हुई ||

मंदी का ये दुर्योधन, मानो द्रौपदी सी अर्थव्यवस्था की इज्ज़त हरने को आतुर |
और ओ'बामा बने कृष्ण, संकट में हैं, कहाँ से लायेंगे इतना बेल-आउट का चीर ||

आर्थिक नुक्सान ने झकझोरा सबको, किसी को ज्यादा तो किसी को कम |
कुछ तो झटका झेल गए, तो कुछ ने लगाया अपने जीवन पर पूर्ण विराम ||

आशा सी डूबती जाती है, आख़िर कब लेगी यह तंगी थोड़ा विश्राम |
किस दिन उगेगा वो सूरज, जिसकी किरणे करेंगी इस दानव का काम तमाम ||

कहतें है समय बड़ा बलवान, और है हर मर्ज की दवा |
दो गोली संतुष्टि की सुबह शाम, सुनो हमारा भी नुस्खा ||

बुरा वक्त तो निकल जाएगा, पर तुम धीरज न खोना |
नौकरी जाए या फिर व्यापर डूबे, आस का साथ न छोडना ||

2 Comments:

Blogger sarksales said...

superb Aryan. You have nice Hindi skills

7:22 PM

 
Blogger sarksales said...

This comment has been removed by the author.

7:22 PM

 

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