Wednesday, May 20, 2009

At Half Moon Bay

Making my first castle with Daddy

Sunday, May 10, 2009

पिंक स्लिप

कुशल मंगल कट रही थी कि, तभी अचानक गिरी एक गाज |
ना बादल गरजे ना बिजली चमकी, फिर भी भयानक थी वो आवाज|

इधर बीवी की नौकरी छूटी, उधर हमारे जीवन की सारी आशाएं टूटी
घर का सपना, अब सिर्फ़ सपना ही बन क़र रह गया
उम्मीद का पिटारा, पिंक स्लिप के साथ बह गया

पहले ही दिन श्रीमतीजी ने, अपने टाइम की प्लानिंग क़र डाली
और मेरे घर पहुँचते ही, अपने फाइनेंस मिनिस्टर बनने की घोषणा क़र डाली
अपनी कुर्सी छिनता देख, मैंने त्योरियां चढाई
उन्होंने कहा, इतना न भड्को, यह है सिर्फ़ ऍफ़ वाई आई
अभी तो मैंने चार्ज संभाला है, आगे आगे देखिये होता है क्या।
अनिष्ट की आशंका से, हम होने ही लगे थे थोड़े परेशान
कि इतने में बेटा लेकर आया, उनका अगला फरमान

आज से लंच घर से लेकर जाओगे
जो बचत हो उससे मुझे शौपिंग कराओगे
और अब जल्दी उठना न होगा मुझसे
सुबह कि बेड-टी भी आप ही बनाओगे
मुन्ने का दूध, टीथ ब्रश, पोट्टी क्लीनिंग का
असीम लुत्फ भी आप ही उठाओगे

शाम को ऑफिस से थोड़ा जल्दी आना
साथ में कुछ स्वीट्स और समोसे भी लाना
घर में अकेले दिल नही लगता है
हमको लोंग ड्राइव पर भी ले जाना

अब बहार के खाने कि क्रेविंग बहुत होती है
इटालियन, चाइनीज और मेक्सिकन खाने कि महक
मन में उमंग और मुंह में पानी घोल देती है
क्यूँ न हम यह नियम बनायें,
हर दूसरे दिन, खाना बहार खाएं

वीकएंड का रहे ख़ास ध्यान
ना कोई मीटिंग, ना रहे पेंडिंग कोई काम
हमको सारे थीम पार्क्स देखने हैं
वार्षिक टिकेट का भी क़र लेना इंतजाम

ख़तम होने का नाम नही लेती थी,
फर्मांइशों कि यह लिस्ट
हमने अपने दांत पीसे
करके क्लोज फिस्ट
फिर एक उत्तम विचार आया
हमारे भी आईडिया का बल्ब जगमगाया
तुंरत ही मन्दिर में एक अर्जी धर दी
जब ले-ऑफ़ में है इतना सुख
हमको भी भिजवा दो
भगवन, एक अदद पिंक स्लिप

Sunday, May 03, 2009

मंदी

कुछ और रोजगार छूटे, कुछ और घरों की नीलामी हुई |
बस इतनी सी बात हुई और मेरे देश में, दिन की शुरुआत हुई ||

मंदी का ये दुर्योधन, मानो द्रौपदी सी अर्थव्यवस्था की इज्ज़त हरने को आतुर |
और ओ'बामा बने कृष्ण, संकट में हैं, कहाँ से लायेंगे इतना बेल-आउट का चीर ||

आर्थिक नुक्सान ने झकझोरा सबको, किसी को ज्यादा तो किसी को कम |
कुछ तो झटका झेल गए, तो कुछ ने लगाया अपने जीवन पर पूर्ण विराम ||

आशा सी डूबती जाती है, आख़िर कब लेगी यह तंगी थोड़ा विश्राम |
किस दिन उगेगा वो सूरज, जिसकी किरणे करेंगी इस दानव का काम तमाम ||

कहतें है समय बड़ा बलवान, और है हर मर्ज की दवा |
दो गोली संतुष्टि की सुबह शाम, सुनो हमारा भी नुस्खा ||

बुरा वक्त तो निकल जाएगा, पर तुम धीरज न खोना |
नौकरी जाए या फिर व्यापर डूबे, आस का साथ न छोडना ||