Monday, September 14, 2009

जीवन बिखरा पड़ा है

 बच्चों का  झुंड
और उनकी चिल्ल-पों में
डूबा मेरा मन 
उनकी इस मासूमियत में 
मुझे लगे जैसे मेरा 
बचपन बिखरा पड़ा है
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गरबा की रात है
थिरकते हैं बदन
और नाचती है गोरियां
दमकते रूप की 
भभकती आंच में 
हुस्न बिखरा पड़ा है
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छलकते जाम खनकती बोतलें
मदिरा के उस नशे में

साकी के महकते इत्र में
हलके गहरे धुंए में
टूटे कांच के टुकडों में
मेरा वजूद बिखरा पड़ा है
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बारिश नहीं, एक और अकाल

प्यासी धरती की दरारों में
बूढी धंसी आँखों में
दमे की खुल्ल-खुल्ल में
बिवाई से रिसते मवाद में
मेरा भारत बिखरा पड़ा है

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